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    सहरसा:न होने दें शिशुओं में विटामिन डी की कमी, रखें खान-पान का ख्याल


    न होने दें शिशुओं में विटामिन डी की कमी, रखें खान-पान का ख्याल
    - शिशुओं के विकास में विटामिन डी का है महत्वपूर्ण योगदान
    - हड्डियों का रखवाला है विटामिन डी


    16 अक्टूबर, सहरसा-
    हम सबको पर्याप्त पोषक तत्वों की दरकार होती है और बच्चों को तो बड़ों के मुकाबले खाने में पोषक तत्वों की जरूरत ज्यादा होती है, क्यों कि इस समय उनकी प्रतिरोधक क्षमता कम होती है और यह उनके बढ़ने की उम्र होती है जिसके कारण उनपर अधिक ध्यान देने की जरूरत होती है। सिविल सर्जन डॉ. अवधेश कुमार सिंह ने शिशुओं के चहुमुखी विकास में सहायक विटामिनों की भूमिका पर बल देते हुए कहा कि शिशुओं के विकास में विटामिन डी का महत्वपूर्ण योगदान है। ये सुक्ष्म पोषक तत्व यानि विटामिन मानव शरीर के विकास एवं कार्यशीलता बनाये रखने में अपनी अहम भूमिका निभाते हैं। खासकर विटामिन डी एक ऐसा विटामिन जो प्राकृतिक माध्यय सूर्य के प्रकाश से मिलती है।

    क्यों है शिशुओं के लिए विटामिन डी महत्वपूर्ण
    सिविल सर्जन डॉ. अवधेश कुमार सिंह ने बताया अन्य सभी विटामिनों के बीच विटामिन डी ही एक तत्व है जो शिशुओं को उनकी पूरी शक्ति और ऊर्जा से साथ खेलने लायक बनाये रखता है। उन्होंने बताया हड्डियों का रखवाला है विटामिन डी। यह शिशुओं के अस्थियों का कड़ापन, टूटना-फूटना, भार सहने आदि जैसे कई महत्वपूर्ण कार्यों में कैल्शियम व फास्फोरस की अहम भूमिका है। खासकर विटामिन डी तथा कैल्शियम ही यह सुनिश्चित करता है कि शिशुओं के शरीर की अस्थियाँ अन्य आवश्यकताओं से बंचित न रहने पाये। कोशिकाओं के कायर्प्रणाली के सफल संचालन में भी कैल्शियम की अहम भूमिका है।

    क्या हैं विटामिन डी के कमी के लक्षण-
    शिशुओं में विटामिन डी की कमी से होने वाले प्रभावों के बारे में बताते हुए सिविल सर्जन डॉ. अवधेश कुमार सिंह ने कहा कि विटामिन डी की कमी के लक्षणों में शिशुओं का शारीरिक विकास अवरूद्ध होना, चिड़चिड़पन एवं सुस्ती आना, कई बच्चों को दौरे भी पड़ते हैं जैसे मांसपेशियों में ऐठन एवं कमजोरी महसूस करना, सांस लेने में तकलीफ यानि सांस लेते समय सीटी बजने की आवाज आना, दांत निकलने में देरी होना, अस्थियों में विकृति का आना आदि मुख्य लक्षण हैं।

    किस प्रकार करें विटामिन डी की क्षतिपूर्ति-
    सिविल सर्जन डॉ. अवधेश कुमार सिंह ने कहा सूर्य विटामिन डी का एक महत्वपूर्ण श्रोत है। जो यहाँ के बढ़ते एवं खेलते बच्चों स्वतः ही प्राप्त हो जाती है। वैसे शिशु जो सांवले हैं कुछ अधिक देर तक धूप में रह सकते हैं, किन्तु गोरी त्वचा वाले शिशु पाँच से पन्द्रह मिनट तक ही घर की छत या फिर आँगन में धूप में रहकर विटामिन डी नैसर्गिक रूप से प्राप्त कर सकते हैं। साथ ही  विटामिन डी युक्त खाद्य पदार्थों जैसे- दूध, दही, पनीर, अंडा, मांस-मछली आदि को शिशुओं के भोजन का अभिन्न अंग बनाते हुए शिशुओं को विटामिन डी की कमी से दूर रखा जा सकता है। इसके अलावा विटामिन डी टैबलेट एवं सीरप के रूप में भी उपलब्ध है, उनका भी चिकित्सीय सलाह के अनुरूप सेवन किया जा सकता है।
    साथ ही उन्होंने बताया कोरोना संक्रमण के बचाव भी बहुत जरूरी है।  इसके लिए हर व्यक्ति को कोरोना काल में 2 गज की शारीरिक दूरी, हमेशा मास्क का प्रयोग, हाथों को नियमित सैनिटाइज करना, साफ-सफाई पर ध्यान इत्यादि का भी खयाल रखना चाहिए जिससे कि हमें जल्द ही कोरोना जैसे संक्रामक बीमारी से निकलने में सफलता मिल सके.

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